नई दिल्ली/ब्यूरो: भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को लेकर एक अत्यंत प्रभावशाली और कड़ा बयान दिया है। डोभाल ने अतीत की घटनाओं पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि सदियों तक हमारे मंदिरों और आस्था के केंद्रों को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा लूटा गया और उस समय हम असहाय होकर यह सब देखते रहे। उन्होंने आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब हमें अपने गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित कर उन अपमानों का ‘बदला’ लेना होगा।
अतीत की बेबसी पर डोभाल का दर्द
अपने संबोधन में अजीत डोभाल ने भारत के संघर्षपूर्ण इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा:
- सांस्कृतिक विनाश: उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत के मंदिरों को केवल धन-दौलत के लिए नहीं, बल्कि भारतीय चेतना और सभ्यता को चोट पहुँचाने के लिए निशाना बनाया गया था।
- मूकदर्शक बना समाज: डोभाल ने अफसोस जताया कि ऐतिहासिक कालखंड में जब हमारी विरासत को नष्ट किया जा रहा था, तब तत्कालीन समाज एकजुट होकर प्रतिकार करने में विफल रहा और बेबसी की स्थिति में रहा।
‘बदला’ लेने का अर्थ: विकास और शक्ति
डोभाल ने ‘बदले’ शब्द को एक व्यापक और सकारात्मक संदर्भ में परिभाषित किया। उनके अनुसार, इतिहास का बदला लेने का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि निम्नलिखित है:
- सांस्कृतिक पुनरुत्थान: नष्ट किए गए प्रतीकों और मंदिरों का पुनर्निर्माण कर अपनी खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को फिर से स्थापित करना।
- सशक्त भारत का निर्माण: भारत को इतना शक्तिशाली बनाना कि भविष्य में कोई भी बाहरी ताकत हमारी आस्था और सीमाओं की ओर आँख उठाकर देखने का साहस न कर सके।
- आत्मसम्मान की जागृति: नई पीढ़ी के भीतर अपने इतिहास के प्रति गौरव की भावना पैदा करना और गुलामी की मानसिकता को पूरी तरह समाप्त करना।
राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता पर जोर
एनएसए ने यह भी स्पष्ट किया कि एक मजबूत राष्ट्र वही होता है जिसकी जड़ें अपनी संस्कृति में गहरी होती हैं। उन्होंने संकेत दिया कि आधुनिक भारत न केवल अपनी रक्षा करने में सक्षम है, बल्कि वह अपने ऐतिहासिक गौरव को वापस पाने के लिए भी पूरी तरह तैयार है। उनके इस बयान को हाल के वर्षों में केदारनाथ, काशी विश्वनाथ और अयोध्या जैसे धार्मिक स्थलों के कायाकल्प की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से जोड़कर देखा जा रहा है।
निष्कर्ष: नई दिशा की ओर भारत
अजीत डोभाल का यह बयान वर्तमान सरकार के उस विजन को दर्शाता है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को सर्वोपरि रखा गया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि भारत अब अपनी विरासत के प्रति उदासीन नहीं रहेगा और इतिहास में हुई गलतियों को सुधारना ही आने वाले समय का मुख्य लक्ष्य होगा।





