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वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया: शांति वार्ता विफल होते ही कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग; 100 डॉलर के पार पहुँचा ‘क्रूड ऑइल’

न्यूयॉर्क/वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में चल रही बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता के बेनतीजा खत्म होने का सीधा और विनाशकारी असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर देखने को मिला है। शनिवार को वार्ता विफल होने की खबर सार्वजनिक होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अमेरिकी केंद्रीय कमान (US Central Command) ने ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी (Naval Blockade) करने की औपचारिक घोषणा कर दी। इस रणनीतिक टकराव ने निवेशकों के बीच आपूर्ति ठप होने का डर पैदा कर दिया है, जिससे तेल की कीमतें एक बार फिर मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गई हैं।

कीमतों में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोत्तरी: 104 डॉलर के करीब पहुँचा अमेरिकी क्रूड

वार्ता की विफलता के चंद घंटों के भीतर ही तेल की कीमतों ने ऊर्ध्वगामी रुख अख्तियार कर लिया।

  • WTI क्रूड में उछाल: अमेरिका में कच्चे तेल (WTI) की कीमतों में 8 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह 104.24 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया।
  • ब्रेंट क्रूड की स्थिति: अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत भी 7 प्रतिशत चढ़कर 102.29 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।
  • तुलनात्मक विश्लेषण: यह वही बेंचमार्क है जो फरवरी के अंत में युद्ध की आहट से पहले लगभग 70 डॉलर के आसपास स्थिर था। हालांकि, संघर्ष के चरम के दौरान यह 119 डॉलर के पार भी जा चुका है, लेकिन वर्तमान उछाल ने बाजार में फिर से अस्थिरता पैदा कर दी है।

नौसैनिक नाकाबंदी ने बढ़ाया तनाव

अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी करने के फैसले ने ‘आग में घी’ डालने का काम किया है।

  • आपूर्ति श्रृंखला पर खतरा: नौसैनिक नाकाबंदी का सीधा अर्थ है कि ईरान से होने वाला तेल निर्यात पूरी तरह ठप हो सकता है। चूंकि ईरान वैश्विक तेल बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए आपूर्ति में किसी भी कमी का सीधा असर कीमतों पर पड़ता है।
  • वैश्विक प्रभाव: विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नाकाबंदी लंबे समय तक जारी रहती है, तो आने वाले दिनों में विकसित और विकासशील दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति (Inflation) की दर तेजी से बढ़ सकती है।

बाजार में बढ़ी अनिश्चितता और ‘पैनिक बाइंग’

शांति की उम्मीदें टूटने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में अफरा-तफरी का माहौल है।

  • निवेशकों का डर: कूटनीतिक समाधान न निकलने से निवेशकों को डर है कि मध्य पूर्व में सैन्य संघर्ष और तेज हो सकता है, जिससे तेल उत्पादन केंद्रों को नुकसान पहुँच सकता है।
  • भारत पर असर: कच्चे तेल की कीमतों में इस वृद्धि का सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा, जहाँ पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पुनः वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।

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