वॉशिंगटन/कराकस: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला में किए गए हालिया घटनाक्रमों और वहां सत्ता परिवर्तन के प्रयासों को खुद अमेरिकी कॉरपोरेट जगत से बड़ा झटका लगा है। प्रमुख अमेरिकी कंपनियों और दिग्गज निवेशकों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि वर्तमान परिस्थितियों में वेनेजुएला में निवेश करना ‘लगभग असंभव’ है। कंपनियों के इस रुख ने ट्रंप प्रशासन की उस योजना पर पानी फेर दिया है, जिसके तहत वेनेजुएला के संसाधनों पर अमेरिकी नियंत्रण की उम्मीद जताई जा रही थी।
निवेशकों के पीछे हटने के मुख्य कारण
अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वॉल स्ट्रीट के विशेषज्ञों ने वेनेजुएला की जमीन पर पैसा लगाने से इनकार करने के पीछे कई ठोस कारण गिनाए हैं:
- बुनियादी ढांचे का विनाश: वर्षों के आर्थिक संकट के कारण वेनेजुएला का बिजली ग्रिड, परिवहन व्यवस्था और संचार नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
- कानूनी जोखिम और अनिश्चितता: कंपनियों को डर है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वहां की अस्थिर सरकार के बीच उनके निवेश की कोई कानूनी सुरक्षा नहीं होगी।
- हाइपर-इंफ्लेशन: वेनेजुएला की मुद्रा ‘बोलिवर’ की गिरती कीमत और अत्यधिक महंगाई ने किसी भी प्रकार के वित्तीय आकलन को अर्थहीन बना दिया है।
ट्रंप की रणनीति को लगा बड़ा झटका
राष्ट्रपति ट्रंप का मानना था कि वेनेजुएला में अमेरिकी प्रभाव बढ़ने से वहां के विशाल तेल भंडारों तक अमेरिकी कंपनियों की पहुंच आसान हो जाएगी।
- तेल उद्योग की बदहाली: विशेषज्ञों का कहना है कि वेनेजुएला के तेल क्षेत्र को फिर से जीवित करने के लिए अरबों डॉलर के निवेश और दशकों के समय की आवश्यकता है, जिसके लिए वर्तमान में कोई भी अमेरिकी कंपनी तैयार नहीं है।
- भू-राजनीतिक जोखिम: रूस और चीन की वेनेजुएला में पहले से मौजूद उपस्थिति अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़ी प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा संबंधी चिंता बनी हुई है。
व्हाइट हाउस की बढ़ी चिंता
अमेरिकी कंपनियों के इस असहयोग ने व्हाइट हाउस को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है। प्रशासन को उम्मीद थी कि सैन्य और राजनैतिक दबाव के बाद आर्थिक निवेश के जरिए वेनेजुएला को जल्द ही ‘अमेरिकी सांचे’ में ढाल लिया जाएगा। लेकिन अब आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक वहां पूर्ण शांति और सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, तब तक डॉलर का निवेश केवल एक ‘जुआ’ होगा।
निष्कर्ष: दांव पर लगी साख
वेनेजुएला का संकट अब केवल एक राजनैतिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह ट्रंप प्रशासन के लिए एक ‘आर्थिक गतिरोध’ बन गया है। अपनी ही कंपनियों द्वारा हाथ खींच लेने से यह साफ हो गया है कि केवल सैन्य शक्ति के बल पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करना संभव नहीं है।





