नई दिल्ली: ‘एक देश-एक चुनाव’ (One Nation-One Election) के मुद्दे पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक में पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने अपनी महत्वपूर्ण राय साझा की है। समिति के सामने अपना पक्ष रखते हुए पूर्व सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि देश में किसी भी बड़े प्रशासनिक या चुनावी सुधार को लागू करते समय संविधान की मूल भावना का सम्मान करना अनिवार्य है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में “संविधान से बढ़कर कुछ भी नहीं है” और किसी भी बदलाव को संवैधानिक ढांचे के भीतर ही फिट होना चाहिए।
संविधान की सर्वोच्चता और संघीय ढांचा
पूर्व सीजेआई ने समिति को संबोधित करते हुए कई तकनीकी और संवैधानिक पहलुओं पर ध्यान आकर्षित किया:
- मूल ढांचे का संरक्षण: उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावी सुधारों की प्रक्रिया में संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
- राज्यों के अधिकार: पूर्व सीजेआई ने कहा कि भारत एक संघीय राष्ट्र है, इसलिए एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव पर राज्यों की सहमति और उनके अधिकारों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
- विधिक स्पष्टता: उन्होंने सुझाव दिया कि यदि संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन की आवश्यकता पड़ती है, तो वह प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और न्यायिक समीक्षा के दायरे में होनी चाहिए।
प्रशासनिक लाभ बनाम संवैधानिक चुनौतियां
बैठक के दौरान ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ के फायदों और संभावित अड़चनों पर भी चर्चा हुई:
- संसाधनों की बचत: समिति के कुछ सदस्यों ने तर्क दिया कि एक साथ चुनाव होने से देश के करोड़ों रुपये और प्रशासनिक श्रम की बचत होगी, जिस पर पूर्व सीजेआई ने सहमति जताई कि आर्थिक लाभ महत्वपूर्ण हैं लेकिन वे संवैधानिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकते।
- स्थिरता की आवश्यकता: चर्चा में यह बात भी आई कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। पूर्व सीजेआई ने इस पर राय दी कि लोकतांत्रिक स्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता के बीच एक महीन संतुलन बनाना होगा।
- कानूनी पेच: विधानसभाओं के कार्यकाल को कम करने या बढ़ाने की स्थिति में उत्पन्न होने वाली कानूनी चुनौतियों पर भी विस्तृत चर्चा की गई।
JPC की भूमिका और भविष्य की राह
संसदीय समिति विभिन्न हितधारकों, कानूनविदों और राजनीतिक दलों से राय जुटा रही है:
- आम सहमति का प्रयास: जेपीसी का लक्ष्य एक ऐसी रिपोर्ट तैयार करना है जो सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो और जिसे संसद में मजबूती के साथ रखा जा सके।
- न्यायिक विशेषज्ञों की राय: पूर्व सीजेआई गवई के बयानों को इस दिशा में बहुत अहम माना जा रहा है क्योंकि वे कानूनी बारीकियों के विशेषज्ञ हैं।





