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लोकसभा में ट्रांसजेंडर (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक पारित: कड़े दंड का प्रावधान; विपक्ष के हंगामे के बीच ‘ध्वनिमत’ से मिली मंजूरी

नई दिल्ली (25 मार्च, 2026): केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के सामाजिक समावेशन और उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा विधायी कदम उठाया है। मंगलवार को लोकसभा में भारी हंगामे और विपक्ष के तीखे विरोध के बीच ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक-2026’ को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इस नए कानून का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अपराधों के लिए तय की गई सजा की अवधि में भारी बढ़ोतरी है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने चर्चा का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि यह संशोधन उन लोगों को सुरक्षा कवच प्रदान करेगा, जो जैविक कारणों (Biological reasons) से सामाजिक बहिष्कार और प्रताड़ना का सामना करते हैं।

सजा के प्रावधानों में बड़ा बदलाव: 2 साल से बढ़कर हुई 14 साल

संशोधन विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है:

  • कठोर दंड: 2019 के मूल कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का हनन करने या उनके साथ दुर्व्यवहार करने पर अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान था। नए संशोधन के बाद इसे बढ़ाकर अब अधिकतम 14 साल की जेल कर दिया गया है।
  • सुरक्षा का दायरा: केंद्रीय मंत्री ने सदन को बताया कि सजा में यह वृद्धि इसलिए की गई है ताकि अपराधियों के मन में डर पैदा हो और इस समुदाय को कानूनी रूप से अधिक सशक्त महसूस कराया जा सके।
  • कानूनी पहचान: विधेयक यह सुनिश्चित करता है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उनकी पहचान का कानूनी प्रमाण पत्र प्राप्त करने में सुगमता हो और उनके साथ होने वाले भेदभाव को अपराध की श्रेणी में रखा जाए।

विपक्ष का हंगामा और सरकार का तर्क

सदन की कार्यवाही के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली:

  1. सामाजिक बहिष्कार का अंत: डॉ. वीरेंद्र कुमार ने कहा कि “बायोलॉजिकल समस्याओं” के कारण समाज में जिस भेदभाव का सामना इस समुदाय को करना पड़ता है, यह विधेयक उस प्रथा को समाप्त करने का माध्यम बनेगा।
  2. विपक्ष की आपत्तियां: कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों, विशेष रूप से ‘सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन’ और सजा के वर्गीकरण को लेकर विरोध जताया। विपक्ष का आरोप था कि सरकार ने इस संवेदनशील विषय पर व्यापक परामर्श नहीं किया है।

ध्वनिमत से पारित: विपक्ष के शोर-शराबे और नारेबाजी के बीच, पीठासीन अधिकारी ने विधेयक को मतदान के लिए रखा और इसे ध्वनिमत से पारित घोषित कर दिया गया।

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