Monday, March 9, 2026

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लद्दाख हिंसा: आंदोलन की चिंगारी कैसे भड़की, सोनम वांगचुक पर क्यों सियासतें तेज?

लेह/देहरादून। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में छठी अनुसूची पूर्ण राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के दौरान बुधवार को हिंसा भड़क उठी—जिसमें चार लोगों की मौत हुई और कई घायल बताए जा रहे हैं। उपद्रवियों ने लेह स्थित भाजपा कार्यालय में आग लगा दी; सुरक्षा व्यवस्था बहाल करने के लिए अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया गया और दर्जनों लोगों को हिरासत में लिया गया।

क्या हुआ — घटनाक्रम का संक्षिप्त चित्र

  • लद्दाख के कई हिस्सों में लंबे समय से छठी अनुसूची व पूर्ण राज्य की माँग उठ रही थी; हालिया प्रदर्शन इस बयान के साथ तेज हुए कि लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा और स्थानीय नियंत्रण को बढ़ाया जाए। प्रदर्शन के दौरान तेजाई तब हुई जब धरने पर बैठे कुछ कार्यकर्ताओं की तबियत बिगड़ी और बाद में बंद (हड़ताल) का एलान हुआ। बंद के दौरान बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए और प्रदर्शनकारियों व सुरक्षा बलों के बीच झमाझम झड़पें हुईं — पथराव और पुलिस की जवाबी कार्रवाई के बीच नौजवानों ने स्थानीय भाजपा कार्यालय में तोड़फोड़ कर आग लगा दी। इसके बाद स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर चली गई। (घटनाक्रम का स्रोत: स्थानीय रिपोर्ट और स्वतंत्र संवाददाता विवरण)।

सोनम वांगचुक — क्यों वे आंदोलन के केंद्र में हैं?

सोनम वांगचुक इंजीनियर, पर्यावरणविद् और लद्दाख के सक्रिय नागरिक नेता हैं। वे वर्षों से शिक्षा व स्थानीय विकास से जुड़े काम में रहे हैं और 2018 में उनके शिक्षा कार्य के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था। 2019 के बाद जब लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया और विधानसभा का प्रावधान नहीं रखा गया, तब से वांगचुक ने लगातार छठी अनुसूची में शामिल करने और पूर्ण राज्य दर्जे की माँग उठाई। हाल के समय में उन्होंने कई भूख हड़तालें और धरने भी किए—इनमें 2024 व 2025 में लंबी अनशनों का सुझाव भी शामिल रहा। (पृष्ठभूमि और आंदोलन के विवरण)।

सरकार का रुख — वांगचुक पर सीधी टिप्पणी और कार्रवाई

केंद्र व लद्दाख प्रशासन ने इस हिंसा के लिए वांगचुक और कुछ संगठनों पर आरोप लगाए। लद्दाख के उप-राज्यपाल ने इसको एक सुनियोजित साजिश बताया और गृह मंत्रालय/केंद्र ने वांगचुक के दो प्रमुख संगठनों — Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) व Himalayan Institute of Alternatives (HIAL) — के FCRA लाइसेंस रद्द कर दिए जाने की घोषणा की। मंत्रालय ने इन संस्थाओं के खिलाफ फंडिंग व वित्तीय विसंगतियों के आरोप लगाए हैं; एक ही समय में सीबीआई द्वारा HIAL व जुड़े मामलों की प्रकृतिगत जांच भी जारी है, जिसका हवाला कई केंद्रीय समाचार एजेंसियों ने दिया है।

वांगचुक ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उन्हें हिंसा के लिए बलि का बकरा बनाया जा रहा है और आन्दोलन के मुद्दों की नब्ज दबाने के लिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने गिरफ्तारी के लिये भी तैयार रहने का इशारा किया पर कहा कि ऐसा करने से समस्या और बढ़ेगी। (वांगचुक के बयान का संक्षेप)।

हिंसा के पीछे गहराई—क्यों छठी अनुसूची की माँग?

छठी अनुसूची (संविधान की व्यवस्था) पारंपरिक रूप से पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्तता, जमीन-परिचालन व स्थानीय अधिकार देने के उद्देश्य से बनाई गई थी। वांगचुक व कई स्थानीय नेताओं का तर्क है कि लद्दाख में भी इसी तरह की संवैधानिक सुरक्षा दी जानी चाहिए ताकि बाहरी निवेश, बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर व भूमि-हस्तांतरण से स्थानीय पारिस्थितिकी, चरागाह और सांस्कृतिक जीवन की सुरक्षा हो सके। 2019 के बाद भूमि व रोजगार के प्रश्न तेज हुए और स्थानीय समुदायों में भय पैदा हुआ कि बाहरी विकास से उनकी जमीन व संसाधन प्रभावित होंगे—इसी चिंता ने छठी अनुसूची व राज्योन्नयन की मांग को बल दिया। (नीतिगत पृष्ठभूमि)।

इससे पहले के आंदोलन और वांगचुक की अगुवाई

वांगचुक ने 2023 और 2024 में भी भूख हड़तालें और लंबी बैठकों का सहारा लिया — बड़े पैमाने पर लोगों ने उनका साथ दिया और कई बार दिल्ली तक ध्यान आकृष्ट करने की कवायद भी हुई (पदल मार्च व ‘दिल्ली चलो’ अभियानों जैसी कवायदें)। 2025 में भी वे और एलएबी (Ladakh Apex Body) के अन्य सदस्य लंबी हड़ताल पर रहे—जो इस बार 35 दिनों की घोषणा थी पर हिंसा के कारण 15 दिनों में ही ठहर गई।

हिंसा के बाद प्रशासनिक सुरक्षा कदम

हिंसा के बाद लेह में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू, स्कूल-कॉलेजों का बंद और भारी सुरक्षा तैनाती की गई। गृह मंत्रालय की टीम स्थिति की समीक्षा के लिए लेह पहुंची; कई स्थानीय नेताओं व प्रतिनिधियों को दिल्ली बुलाकर बातचीत के दौर की व्यवस्था की गयी। सैकड़ों लोगों की हिरासत तथा कुछ स्थानों पर सड़क—परिवहन व सभाओं पर पाबंदियां लागू की गईं। इस बीच मानवाधिकार तथा स्थानीय व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने सुरक्षबलों द्वारा गोलियों के प्रयोग और नागरिक हताहतों की स्वतंत्र जांच की माँग उठाई है।

क्या आगे होने की संभावना है?

केंद्र और स्थानीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) के बीच बातचीत का सिलसिला चल रहा था; सरकार का तर्क रहा कि अधिकांश वांगचुक की मांगे HPC के एजेंडे का हिस्सा हैं और बातचीत के जरिए कई मुद्दों पर प्रगति भी हुई (रिजर्वेशन बढ़ाना, भाषा-संरक्षण, भर्ती पदों पर पहल व अन्य)। पर हिंसा ने संवाद की प्रक्रिया को नरम कर दिया है और प्रशासनिक—कानूनी कार्रवाई, FCRA-रद्दीकरण और CBI की जांच जैसे कदम संभावित रूप से आंदोलन के स्वरूप व स्थानीय राजनीति को और तीखा बना सकते हैं।

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