नई दिल्ली/लखनऊ: भारतीय रेलवे में दशकों तक अपनी सेवाएं देने वाले सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ सम्मान के नाम पर भद्दा मजाक होने का मामला प्रकाश में आया है। रेलवे द्वारा विदाई समारोह के दौरान कर्मचारियों को दिए गए ‘चांदी’ के मेडल असल में तांबे के निकले, जिन पर केवल चांदी की पॉलिश की गई थी। इस फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब कुछ कर्मचारियों ने आर्थिक जरूरत के समय इन मेडलों को जौहरियों के पास बेचा या उनकी जांच कराई। अनुमान है कि इस घोटाले के जरिए रेलवे के खजाने को करोड़ों रुपये की चपत लगाई गई है और हजारों पूर्व कर्मचारियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया है।
कैसे हुआ इस बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा?
यह घोटाला तब सामने आया जब उत्तर और पूर्व-मध्य रेलवे के कुछ सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने अपने मेडलों की शुद्धता की जांच कराई:
- जौहरी की रिपोर्ट: एक रिटायर्ड कर्मचारी जब अपना मेडल लेकर बाजार पहुंचा, तो जौहरी ने उसे यह कहकर वापस कर दिया कि यह चांदी नहीं, बल्कि पॉलिश किया हुआ तांबा है।
- सामूहिक शिकायत: धीरे-धीरे कई अन्य कर्मचारियों ने भी अपने पदकों की जांच कराई और नतीजे चौंकाने वाले निकले। इसके बाद कर्मचारियों ने यूनियन के माध्यम से रेल मंत्रालय और संबंधित जोन के महाप्रबंधकों (GM) को शिकायत भेजी।
- लैब टेस्ट में पुष्टि: प्राथमिक विभागीय जांच और निजी लैब रिपोर्ट में यह बात साबित हो गई है कि सिक्कों में चांदी की मात्रा नाममात्र की थी और अंदरूनी हिस्सा पूरी तरह तांबे या अन्य सस्ती धातुओं से बना था।
भ्रष्टाचार का तरीका: टेंडर से लेकर आपूर्ति तक की मिलीभगत
सूत्रों के अनुसार, इस घोटाले की जड़ें खरीद प्रक्रिया और टेंडर से जुड़ी हुई हैं:
- फर्जी सर्टिफिकेट: मेडल की आपूर्ति करने वाली कंपनियों ने कथित तौर पर शुद्धता के फर्जी सर्टिफिकेट लगाए थे, जिन्हें बिना उचित जांच के स्वीकार कर लिया गया।
- मिलीभगत का संदेह: विभागीय भंडार विभाग (Stores Department) और वित्त विभाग के अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है, क्योंकि बिना उनकी मिलीभगत के इतनी बड़ी मात्रा में नकली पदकों की सप्लाई संभव नहीं थी।
- करोड़ों का गबन: रेलवे हर साल हजारों कर्मचारियों को रिटायरमेंट पर चांदी के मेडल देता है। शुद्ध चांदी की कीमत और तांबे की कीमत के बीच का बड़ा अंतर अधिकारियों और ठेकेदारों की जेब में गया है।
रेलवे बोर्ड का रुख और आगामी कार्रवाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए रेलवे बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाया है:
- विजिलेंस जांच के आदेश: रेल मंत्रालय ने इस पूरे मामले की विजिलेंस (सतर्कता विभाग) जांच के आदेश दे दिए हैं। सभी जोन से पिछले 5 वर्षों में बांटे गए मेडलों का स्टॉक ऑडिट करने को कहा गया है।
- कंपनियों पर प्रतिबंध: नकली मेडल सप्लाई करने वाली कंपनियों को ‘ब्लैक लिस्ट’ करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और उनके भुगतान पर रोक लगा दी गई है।
- दोषियों पर गाज: रेल मंत्री ने स्पष्ट किया है कि जिन भी अधिकारियों ने गुणवत्ता के साथ समझौता किया है, उन्हें सेवा से बर्खास्त करने और उन पर आपराधिक मुकदमा चलाने की कार्रवाई की जाएगी।
कर्मचारी यूनियनों में भारी रोष
रेलवे कर्मचारी संगठनों ने इसे कर्मचारियों के आत्मसम्मान पर चोट बताया है। यूनियनों की मांग है कि:
- सभी प्रभावित सेवानिवृत्त कर्मचारियों को असली चांदी के मेडल वापस दिए जाएं।
- इस मामले की जांच सीबीआई (CBI) से कराई जाए ताकि बड़े ‘नेक्सस’ का पर्दाफाश हो सके।
- भविष्य में मेडल वितरण के समय शुद्धता की हॉलमार्किंग (Hallmarking) अनिवार्य की जाए।
अपने कर्मचारियों को उनके समर्पण के लिए सम्मानित करना रेलवे की एक पुरानी और गौरवशाली परंपरा रही है, लेकिन इस फर्जीवाड़े ने सिस्टम की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन कितनी जल्दी दोषियों को सजा दिला पाता है और पीड़ित पूर्व कर्मचारियों के सम्मान की भरपाई कैसे करता है।





