नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मतदाता सूची की जांच के लिए पहुंचे सात न्यायिक अधिकारियों को उग्र भीड़ ने करीब नौ घंटे तक बंधक बनाए रखा। अधिकारियों में तीन महिलाएं भी शामिल थीं।
जानकारी के अनुसार, यह घटना कालियाचक-II ब्लॉक में उस समय हुई जब अधिकारी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट सुधार का काम कर रहे थे। भीड़ ने कार्यालय को घेर लिया, राष्ट्रीय राजमार्ग-12 को जाम कर दिया और अधिकारियों को भोजन-पानी तक नहीं दिया गया। देर रात भारी पुलिस बल ने उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला।
घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए इसे न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने का गंभीर मामला बताया। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है तथा जांच सीबीआई या एनआईए को सौंपने की संभावना भी जताई है।
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भाजपा ने राज्य सरकार पर कानून-व्यवस्था ध्वस्त होने का आरोप लगाते हुए इसे “स्वतंत्र भारत का काला दिन” बताया। पार्टी नेताओं ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में हिंसा और डर का माहौल बना हुआ है।
वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची संशोधन के नाम पर खास वर्ग के लोगों के नाम हटाने की कोशिश की जा रही थी, जिसके कारण स्थानीय स्तर पर तनाव पैदा हुआ।
मालदा की यह घटना अब न्यायपालिका, प्रशासन और राजनीति—तीनों के लिए परीक्षा बन गई है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद राज्य सरकार पर जवाबदेही का दबाव बढ़ गया है और आने वाले दिनों में इस मामले की जांच तथा राजनीतिक असर पर देशभर की नजर रहेगी।





