मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान में प्रदेश के मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में कोई विशेष आरक्षण नहीं दिया जाएगा। पूर्व में प्रस्तावित 5% मुस्लिम कोटे को आधिकारिक रूप से लागू न करने के फैसले के साथ ही इस पर जारी लंबी कानूनी और राजनीतिक बहस फिलहाल थम गई है। सरकार का तर्क है कि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता है, इसलिए इसे मौजूदा स्वरूप में जारी रखना संवैधानिक रूप से संभव नहीं है।
विवाद की पृष्ठभूमि: कैसे खत्म हुआ कोटा?
मुस्लिम आरक्षण का मामला पिछले एक दशक से अदालतों और अध्यादेशों के बीच फंसा हुआ था:
- 2014 का अध्यादेश: तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने चुनाव से ठीक पहले एक अध्यादेश के जरिए मुस्लिमों को 5% आरक्षण दिया था।
- बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख: उस समय कोर्ट ने नौकरियों में आरक्षण पर तो रोक लगा दी थी, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों में इसे जारी रखने की अनुमति दी थी।
- अध्यादेश की समाप्ति: पिछली सरकारों द्वारा इस अध्यादेश को कानून में नहीं बदला गया, जिसके कारण इसकी समय सीमा समाप्त हो गई। वर्तमान प्रशासन ने इसे दोबारा लागू करने या नया कानून लाने से इनकार कर दिया है।
सरकार का रुख: ‘संवैधानिक मर्यादा’ का तर्क
महाराष्ट्र सरकार ने सदन और सार्वजनिक मंचों पर इस निर्णय के पीछे कई कारण गिनाए हैं:
- धर्म आधारित आरक्षण का विरोध: सरकार का मानना है कि धर्म के आधार पर कोटा देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
- पिछड़ापन और वर्गीकरण: प्रशासन का कहना है कि मुस्लिम समुदाय के जो वर्ग आर्थिक या सामाजिक रूप से पिछड़े हैं, उन्हें पहले से ही ओबीसी (OBC) या ईडब्ल्यूएस (EWS) श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ मिल रहा है।
- मराठा और अन्य आरक्षण: वर्तमान में सरकार का पूरा ध्यान मराठा आरक्षण और अन्य मौजूदा श्रेणियों के हितों की रक्षा पर केंद्रित है।
विपक्ष और मुस्लिम संगठनों का विरोध
इस फैसले के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में विरोध की लहर तेज हो गई है:
- आर्थिक पिछड़ेपन की दलील: विपक्षी दलों और कई मुस्लिम संगठनों का कहना है कि ‘सच्चर कमेटी’ और ‘महमूद उर रहमान समिति’ की रिपोर्टों ने समुदाय के पिछड़ेपन को साबित किया है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
- अदालत जाने की तैयारी: कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। उनका तर्क है कि जब हाई कोर्ट ने शिक्षा में आरक्षण को सही माना था, तो सरकार ने उसे लागू क्यों नहीं किया।





