कोच्चि। केरल हाई कोर्ट ने महंगी जीवनरक्षक पेटेंट दवाओं को मरीजों की पहुंच में लाने को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 100 का इस्तेमाल कर पेटेंट वाली दवाओं का निर्माण या उनकी उपलब्धता सुनिश्चित कर सकती है और जरूरतमंद मरीजों को गैर-वाणिज्यिक आधार पर दवा उपलब्ध करा सकती है।
न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने कहा कि यदि किसी पेटेंट दवा की कीमत इतनी अधिक हो कि वह मरीजों की पहुंच से बाहर हो जाए, तो ऐसी स्थिति में सरकार के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, अदालत ने केंद्र सरकार को तत्काल किसी विशेष दवा का उत्पादन शुरू करने का निर्देश नहीं दिया। अंतिम निर्णय सरकार को उपलब्ध आंकड़ों और परिस्थितियों के आधार पर लेना होगा।
पहले जुटाना होगा दवाओं की कीमत और पहुंच का आंकड़ा
अदालत ने केंद्र से कहा कि जीवनरक्षक पेटेंट दवाओं की कीमत और मरीजों की पहुंच से संबंधित जरूरी आंकड़े जुटाए जाएं। इसके आधार पर यह निर्धारित किया जाए कि कोई दवा वास्तव में मरीजों के लिए कितनी सुलभ है। यदि किसी दवा की कीमत अत्यधिक पाई जाती है, तो धारा 100 के तहत हस्तक्षेप पर विचार किया जा सकता है।
स्तन कैंसर की दवा से शुरू हुआ मामला
यह मामला वर्ष 2022 में एक स्तन कैंसर मरीज की याचिका से शुरू हुआ था। मरीज ने रिबोसिक्लिब (Ribociclib) नामक पेटेंट दवा की ऊंची कीमत को लेकर अदालत का रुख किया था। इस दवा की कीमत उस समय करीब 75 हजार रुपये से अधिक प्रति माह बताई गई थी। बाद में मरीज की मृत्यु हो गई, लेकिन अदालत ने मामले को स्वत: संज्ञान वाली कार्यवाही के रूप में जारी रखा।
कार्यवाही के दौरान रिबोसिक्लिब और पैल्बोसिक्लिब (Palbociclib) जैसी दवाओं की उपलब्धता और उनके विकल्प होने पर भी विशेषज्ञों की राय ली गई। अदालत के समक्ष रखी गई जानकारी के आधार पर दोनों दवाओं को एक-दूसरे का सीधा विकल्प नहीं माना गया।
फैसले के बाद अब केंद्र सरकार के सामने पेटेंट वाली महंगी जीवनरक्षक दवाओं की कीमत और मरीजों की पहुंच का आकलन कर आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेने का रास्ता खुला है।




