नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र का पहला चरण हंगामे और भारी गतिरोध के बीच समाप्त हो गया है। इस सत्र ने विकास और बजट पर चर्चा के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की दूरियों को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। सदन की कार्यवाही के दौरान कई अहम विधेयकों और मुद्दों पर चर्चा होनी थी, लेकिन सियासी टकराव के चलते सदन के भीतर आरोप-प्रत्यारोप का दौर हावी रहा। अब जबकि दूसरे चरण की तैयारी है, विपक्ष द्वारा लाए जाने वाले ‘अविश्वास प्रस्ताव’ ने आने वाले दिनों में और अधिक तकरार होने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं।
तनाव की वजह: मुद्दे जिन पर नहीं बनी सहमति
सत्र के पहले चरण में सरकार और विपक्षी दलों के बीच कई मुद्दों पर तलवारें खिंची रहीं:
- आर्थिक नीतियों पर प्रहार: विपक्ष ने बजट को ‘जनविरोधी’ बताते हुए महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को घेरा। वहीं सरकार ने इसे ‘अमृत काल’ का रोडमैप बताते हुए बचाव किया।
- संसदीय मर्यादा का उल्लंघन: दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे पर असंसदीय आचरण और चर्चा से भागने के आरोप लगाए गए। स्थगन के चलते जनता के करोड़ों रुपयों की बर्बादी पर भी बहस छिड़ी।
- जांच एजेंसियों का मुद्दा: विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर विरोधियों को निशाना बना रही है, जिसे लेकर सदन के बाहर और भीतर भारी प्रदर्शन देखने को मिले।
अविश्वास प्रस्ताव: आर-पार की जंग के आसार
आगामी सत्र में विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव के जरिए सरकार की घेराबंदी करने की रणनीति बना रहा है:
- एकजुट होता विपक्ष: कई क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों ने इस मुद्दे पर एक सुर में बात की है। उनका मानना है कि सरकार बुनियादी सवालों के जवाब देने में विफल रही है।
- संख्या बल और रणनीति: हालांकि सरकार के पास पूर्ण बहुमत है, लेकिन विपक्ष का उद्देश्य संख्या बल के बजाय सरकार को नीतिगत मोर्चे पर कटघरे में खड़ा करना और जनता के बीच अपनी आवाज पहुँचाना है।
- सरकार की तैयारी: सत्ता पक्ष ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं और अविश्वास प्रस्ताव के दौरान विपक्ष के ‘नकारात्मक एजेंडे’ को बेनकाब करेंगे।
लोकतंत्र के मंदिर में ‘संवाद’ की कमी
संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ता यह ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (विश्वास की कमी) लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है:
- विधेयकों पर चर्चा का अभाव: हंगामे के कारण कई महत्वपूर्ण कानून बिना पर्याप्त बहस के पारित हो रहे हैं, जो विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
- जनता की उम्मीदें: बजट सत्र से जनता को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन राजनीतिक नूराकुश्ती ने जनहित के मुद्दों को गौण कर दिया है।





