चेन्नई। लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के राज्यों में एक बार फिर राजनीतिक लामबंदी तेज हो गई है। दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने की स्थिति में अपने राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर चिंता जताई है।
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने दक्षिणी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की मांग की है। उनका सुझाव है कि महिलाओं के लिए प्रस्तावित आरक्षण को भी मौजूदा सीटों की सीमा के भीतर ही लागू किया जाए।
दक्षिणी राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण हाल की जनगणना के आधार पर किया जाता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटों में अपेक्षाकृत ज्यादा बढ़ोतरी हो सकती है। इससे दक्षिणी राज्यों का संसद में मौजूदा प्रतिनिधित्व और राजनीतिक प्रभाव कम होने की आशंका जताई जा रही है।
तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना सहित दक्षिण के राज्यों के नेता इस मुद्दे पर साझा रणनीति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने भी कहा है कि परिसीमन की प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व या राजनीतिक हिस्सेदारी को नुकसान पहुंचे।
इस मुद्दे ने केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच संघीय ढांचे, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, इसलिए उन्हें इसका राजनीतिक नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
परिसीमन की बहस अब केवल सीटों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह केंद्र-राज्य संबंधों और देश में क्षेत्रीय राजनीतिक संतुलन का भी अहम मुद्दा बनती जा रही है।





