नई दिल्ली: NCERT (एनसीईआरटी) की पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका से जुड़ी कुछ टिप्पणियों और शब्दावली को लेकर उपजे विवाद पर केंद्र सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस मामले पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा है कि सरकार या NCERT का उद्देश्य किसी भी रूप में देश की न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाना या उसका अपमान करना नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किताबों में किए गए बदलाव केवल ‘तथ्यों को अद्यतन’ (Update) करने और छात्रों को समकालीन न्यायिक प्रक्रियाओं की सही जानकारी देने के उद्देश्य से किए गए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद की जड़ NCERT की राजनीति विज्ञान (Political Science) और अन्य सामाजिक विज्ञान की किताबों में किए गए कुछ हालिया संशोधन हैं:
- न्यायिक सक्रियता पर टिप्पणी: विपक्षी दलों और कुछ कानूनविदों ने आरोप लगाया था कि किताबों में ‘न्यायिक सक्रियता’ (Judicial Activism) और कुछ ऐतिहासिक फैसलों की व्याख्या इस तरह की गई है जिससे न्यायपालिका की छवि धूमिल होती है।
- शब्दावली में बदलाव: आलोचकों का तर्क है कि संशोधनों के माध्यम से लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों के बीच के शक्ति संतुलन को गलत तरीके से पेश करने की कोशिश की गई है।
शिक्षा मंत्री का स्पष्टीकरण: ‘छात्रों का हित सर्वोपरि’
शिक्षा मंत्री ने संसद और मीडिया के माध्यम से इस विवाद पर सरकार का पक्ष मजबूती से रखा:
- विशेषज्ञों की राय: मंत्री ने कहा कि ये बदलाव शिक्षाविदों और विषय विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति द्वारा किए गए हैं, इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप का कोई स्थान नहीं है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020): उन्होंने बताया कि नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम को रटने के बजाय समझने योग्य और आधुनिक बनाया जा रहा है, ताकि छात्र वर्तमान भारत की वास्तविक प्रशासनिक और न्यायिक स्थिति को समझ सकें।
- सम्मान की रक्षा: मंत्री ने दोहराया कि “न्यायपालिका लोकतंत्र का एक अत्यंत सम्मानित और स्वतंत्र स्तंभ है। किताबों में सुधार का अर्थ आलोचना नहीं, बल्कि प्रक्रियाओं का शैक्षणिक विश्लेषण है।”
NCERT का पक्ष: ‘बोझ कम करने की प्रक्रिया’
NCERT के अधिकारियों ने भी इस मामले पर सफाई देते हुए कहा है कि कोविड-19 के बाद से ही छात्रों पर पाठ्यचर्या का बोझ कम करने (Rationalization) की प्रक्रिया चल रही है। इसी के तहत अप्रासंगिक हो चुके या पुराने पड़ चुके संदर्भों को हटाया या बदला जा रहा है। संस्थान का कहना है कि वे किसी भी ऐसे अंश को दोबारा समीक्षा के लिए तैयार हैं जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही हो।





