नई दिल्ली। भारतीय नौसेना ने रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हुए एक युगांतकारी निर्णय लिया है। नौसेना ने अपने विमानवाहक पोतों (INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत) की शान माने जाने वाले रूसी मूल के MiG-29K लड़ाकू विमानों के रखरखाव और महत्वपूर्ण कलपुर्जों के निर्माण के लिए भारतीय निजी उद्योग जगत का आह्वान किया है। इस पहल के तहत अब विमान की जटिल उप-प्रणालियों (Sub-systems) और परीक्षण प्रणालियों का विकास देश की निजी कंपनियों द्वारा किया जाएगा, जिससे रूस और अन्य विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर भारत की दशकों पुरानी निर्भरता समाप्त हो जाएगी।
विदेशी निर्भरता पर लगाम और कूटनीतिक मजबूती
रूसी मूल के विमानों के पुर्जों के लिए भारत को अक्सर लंबी और जटिल आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे कभी-कभी विमानों के समय पर रखरखाव में बाधा आती थी।
- युद्ध की निरंतर तैयारी: नौसेना का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में तैनात फाइटर जेट्स की ‘कॉम्बैट रेडीनेस’ (युद्ध के लिए तत्परता) हर समय शत-प्रतिशत रहे। स्वदेशी पुर्जों की उपलब्धता से मरम्मत और ओवरहॉलिंग का समय काफी कम हो जाएगा।
- रणनीतिक स्वायत्तता: वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच, स्वदेशी निर्माण क्षमता होने से भारत किसी भी विदेशी प्रतिबंध या कूटनीतिक दबाव से मुक्त होकर अपनी सैन्य शक्ति का संचालन कर सकेगा।
निजी कंपनियों को मिला बड़ा अवसर
भारतीय नौसेना ने इस परियोजना के लिए देश की दिग्गज निजी रक्षा कंपनियों को आमंत्रित किया है ताकि वे विमान की तकनीकी रूप से जटिल प्रणालियों का निर्माण कर सकें।
- इंजीनियरिंग और इनोवेशन: निजी क्षेत्र को लड़ाकू विमानों के लिए सटीक ‘टेस्ट बेंच’ और ‘क्रिटिकल सब-सिस्टम्स’ विकसित करने का कार्य सौंपा जाएगा। यह न केवल भारतीय उद्योगों के तकनीकी कौशल को बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य में भारत को रक्षा निर्यात का केंद्र बनाने में भी मदद करेगा।
- नौसेना का सहयोग: नौसेना के तकनीकी विशेषज्ञ इन कंपनियों के साथ मिलकर काम करेंगे ताकि गुणवत्ता और सुरक्षा के कड़े मानकों को सुनिश्चित किया जा सके।
समुद्री सुरक्षा का नया अध्याय
हिंद महासागर में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए, विमानवाहक पोतों की मारक क्षमता को बरकरार रखना भारत के लिए अनिवार्य है।
“मिग-29K के पुर्जों का स्वदेशीकरण केवल आर्थिक बचत नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को ‘बुलेटप्रूफ’ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भारतीय प्रतिभा अब रूसी विमानों को भारतीय तकनीक से और अधिक घातक बनाएगी।” — वरिष्ठ नौसैनिक अधिकारी





