नैनीताल: उत्तराखंड में नगर निकाय चुनाव लड़ने के लिए लागू दो बच्चों की अनिवार्यता के प्रावधान को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में इस नियम की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे समानता के अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी के सिद्धांतों के खिलाफ बताया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष तर्क दिया गया है कि जनप्रतिनिधित्व के लिए केवल परिवार के आकार के आधार पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकना उचित नहीं है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान नागरिकों के चुनावी अधिकारों को प्रभावित करता है और इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।
उत्तराखंड में दो बच्चों की नीति पहले पंचायत चुनावों के संदर्भ में लागू की गई थी। राज्य सरकार ने इसे परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया था। इस प्रावधान के तहत दो से अधिक जीवित बच्चों वाले व्यक्तियों को स्थानीय चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने का प्रावधान किया गया था।
अब नगर निकाय चुनावों में इस नियम को लेकर उठे विवाद ने एक नई कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि स्थानीय निकायों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के अवसरों को सीमित करने वाले ऐसे प्रावधानों पर नए सिरे से विचार जरूरी है।
गौरतलब है कि देश के कई राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए दो बच्चों की सीमा से जुड़े नियम लागू रहे हैं, लेकिन समय-समय पर इनकी संवैधानिकता और प्रासंगिकता पर न्यायालयों में सवाल उठते रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्थानीय चुनावों में दो बच्चों के मानदंड को लेकर इसकी उपयोगिता और मौजूदा परिस्थितियों पर विचार की आवश्यकता जताई थी।
मामले पर अब हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तय होगा कि नगर निकाय चुनावों में लागू इस शर्त को जारी रखा जाए या इसमें बदलाव की आवश्यकता है। अदालत के फैसले का असर राज्य में आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।





