देहरादून। विश्वविख्यात नंदा देवी राजजात यात्रा मार्ग का अब वैज्ञानिक ढंग से पारिस्थितिकीय अध्ययन किया जाएगा। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) के वैज्ञानिक इस मार्ग पर विशेष अध्ययन कर पर्यावरणीय असर और भार धारण क्षमता (Carrying Capacity) का आकलन करेंगे। इस पहल का उद्देश्य है कि यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या नियंत्रित कर प्रकृति और सांस्कृतिक धरोहर दोनों को संरक्षित किया जा सके।
यूसैक के विशेषज्ञों ने बताया कि अध्ययन में उपग्रह आंकड़े, जीआईएस तकनीक और फील्ड सर्वे का उपयोग किया जाएगा। इससे यह पता लगाया जाएगा कि मार्ग पर एक समय में कितने श्रद्धालु और यात्री सुरक्षित रूप से यात्रा कर सकते हैं, ताकि अति-भार से पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।
गौरतलब है कि नंदा देवी राजजात यात्रा हर 12 साल में आयोजित होती है, जिसमें देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और शोधार्थी शामिल होते हैं। यात्रा मार्ग कई संवेदनशील पारिस्थितिकीय क्षेत्रों, उच्च हिमालयी घाटियों और चारागाहों से होकर गुजरता है। भीड़ बढ़ने से यहां की नाजुक पारिस्थितिकी और जैव विविधता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
अधिकारियों का कहना है कि अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर यात्रा प्रबंधन की रूपरेखा तैयार की जाएगी। इसमें श्रद्धालुओं की संख्या, ठहराव स्थलों का चयन, कचरा प्रबंधन और आपदा सुरक्षा जैसे बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस पहल का स्वागत किया है। उनका मानना है कि वैज्ञानिक अध्ययन से न केवल यात्रा मार्ग सुरक्षित होगा बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए नंदा देवी की इस सांस्कृतिक-आध्यात्मिक परंपरा को भी संरक्षित किया जा सकेगा।





