नई दिल्ली: ओमान की खाड़ी में हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने के बीच भारत की तेल सुरक्षा चुनौती और रणनीति केंद्रित हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाड़ी में स्थिति बिगड़ती है, तो भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए वैकल्पिक रास्तों और भंडार क्षमता पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के कुल समुद्री तेल परिवहन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की अस्थिरता वैश्विक तेल कीमतों में तेजी और भारत जैसी आयातक अर्थव्यवस्थाओं पर भारी दबाव डाल सकती है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि देश की करीब 80 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए वह आयात पर निर्भर है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत ने पहले ही रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves – SPR) बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। वर्तमान में भारत के पास तीन प्रमुख SPR साइटें हैं—मंगलुरु, माणिकपूर और वड़ोदरा। इन भंडारों में लगभग 5.33 करोड़ बैरल तेल संग्रहीत है, जो देश की लगभग 10-दिन की तेल खपत को पूरा कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाड़ी में तनाव अधिक समय तक बना रहता है, तो भारत को अतिरिक्त भंडारों और अन्य आपूर्ति मार्गों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इसके अलावा, न केवल ऊर्जा सुरक्षा बल्कि विदेशी मुद्रा संकट से बचने के लिए भी वैकल्पिक खरीद विकल्पों और तेल रिफाइनिंग क्षमता में सुधार जरूरी होगा।
विदेश मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा है कि भारत लगातार खाड़ी में स्थिति पर नजर बनाए हुए है और सभी संभावित संकटों के लिए तैयार है। “हमारे पास रणनीतिक भंडार और आपूर्ति विकल्प मौजूद हैं, और हम वैश्विक बाजारों से तेल आयात की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं,” एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि हॉर्मुज संकट ने भारत के लिए घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर निवेश करने की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। भविष्य में ऐसे संकटों से निपटने के लिए दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और वैकल्पिक मार्गों पर ध्यान देना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक भंडार और वैश्विक आपूर्ति विकल्पों की अहमियत को एक बार फिर उजागर किया है। सरकार की रणनीति और तैयारियों पर अब दुनिया की नजर बनी हुई है।





