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डॉक्टरों से मारपीट मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, राकेश म्हात्रे की जमानत पर उठाए सवाल

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के डोंबिवली में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों से कथित मारपीट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्षद रमेश सुखरिया म्हात्रे की जमानत को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर हमला करने वालों को खुलेआम घूमने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से दाखिल जमानत रद्द करने की याचिका पर म्हात्रे से जवाब भी मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।

जमानत रद्द करने की मांग पर नोटिस

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें म्हात्रे को मिली जमानत रद्द करने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने डॉक्टरों पर लगातार हो रहे हमलों पर चिंता जताई और कहा कि ऐसे मामलों में समाज को कड़ा संदेश जाना जरूरी है।

म्हात्रे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी पेश हुए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। यह याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा जमानत देते समय लगाई गई कुछ शर्तों को चुनौती देने से संबंधित थी।

जुलाई में अस्पताल में हुआ था विवाद

मामला 6 जुलाई का है, जब डोंबिवली के शास्त्रीनगर अस्पताल में इलाज को लेकर विवाद के बाद डॉक्टरों और कर्मचारियों के साथ कथित मारपीट हुई थी। आरोप है कि एक गर्भवती महिला को इलाज के लिए दूसरे अस्पताल में भेजे जाने के बाद म्हात्रे और उनके साथियों ने अस्पताल पहुंचकर डॉक्टरों के साथ मारपीट की। इस मामले में म्हात्रे और अन्य आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।

पहले निचली अदालत ने म्हात्रे को जमानत दी थी, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी। बाद में 7 अगस्त को हाई कोर्ट ने जमानत मंजूर करते हुए कड़ी शर्तें लगाईं। इनमें आरोपपत्र दाखिल होने तक महाराष्ट्र से बाहर रहने की शर्त भी शामिल थी।

डॉक्टरों पर हमलों को लेकर चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर हमले को सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला नहीं माना जा सकता। अदालत ने हाल में पालघर में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर हुए एक अन्य कथित हमले का भी उल्लेख किया। शीर्ष अदालत ने ऐसे मामलों पर प्रभावी रोक लगाने के लिए कड़ा संदेश देने की जरूरत बताई।

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