Saturday, January 31, 2026

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जौनसारी रंग में रंगे आचार्य बालकृष्ण: पारंपरिक ‘जूडौ’ पहनकर जमकर थिरके; लोक संस्कृति के संरक्षण का दिया संदेश

देहरादून: उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले देहरादून के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर की परंपराओं का जादू एक बार फिर देखने को मिला। पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने हाल ही में जौनसार की पारंपरिक वेशभूषा ‘जूडौ’ धारण कर स्थानीय ग्रामीणों के साथ लोक नृत्य किया। इस अनूठे दृश्य ने न केवल वहां मौजूद लोगों का मन मोह लिया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी पहाड़ी संस्कृति की इस झलक को खूब सराहना मिल रही है। आचार्य बालकृष्ण ने इस दौरान उत्तराखंड की लोक विधाओं और परंपराओं को सहेजने पर जोर दिया।

पारंपरिक वेशभूषा और लोक धुनों का संगम

जौनसार-बावर क्षेत्र के एक प्रवास के दौरान आचार्य बालकृष्ण पूरी तरह स्थानीय रंग में रंगे नजर आए:

  • जूडौ की शान: आचार्य ने जौनसार का पारंपरिक ऊनी चोगा यानी ‘जूडौ’ और सिर पर विशिष्ट टोपी पहनी थी। यह वेशभूषा इस क्षेत्र की पहचान और गौरव का प्रतीक मानी जाती है।
  • तांदी और रासो नृत्य: ढोल-दमाऊ की थाप और रणसिंगे की गूंज के बीच आचार्य बालकृष्ण ने ग्रामीणों के साथ घेरा बनाकर ‘तांदी’ और ‘रासो’ जैसे प्रसिद्ध लोक नृत्यों में शिरकत की। उनके कदम से कदम मिलाकर थिरकने के अंदाज ने स्थानीय लोगों को भाव-विभोर कर दिया।

“संस्कृति ही हमारी जड़ें हैं”: आचार्य बालकृष्ण

नृत्य के उपरांत उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए आचार्य बालकृष्ण ने जौनसार की परंपराओं की खुले मन से प्रशंसा की।

  1. विरासत का सम्मान: उन्होंने कहा कि जौनसार-बावर की कला, संस्कृति और खान-पान अद्भुत है। यहाँ के लोग आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं, जो आधुनिक युग में एक मिसाल है।
  2. पर्यटन और आयुर्वेद: आचार्य ने क्षेत्र में उपलब्ध जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक सुंदरता का जिक्र करते हुए कहा कि जौनसार में आयुर्वेद और वेलनेस टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं।
  3. स्थानीय परिधानों को बढ़ावा: उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी पारंपरिक वेशभूषा और लोक गीतों पर गर्व करें, क्योंकि यही हमारी असली पहचान है।

जौनसार में खुशी की लहर

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने आचार्य बालकृष्ण का भव्य स्वागत किया। ग्रामीणों का कहना है कि जब देश की जानी-मानी हस्तियां उनकी संस्कृति को अपनाती हैं, तो इससे स्थानीय कला को वैश्विक स्तर पर पहचान मिलती है।

  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान: इस आयोजन के माध्यम से जौनसार की ‘हारुल’ और ‘मांगल’ जैसी गायन शैलियों पर भी चर्चा हुई।
  • सोशल मीडिया पर वायरल: आचार्य बालकृष्ण के नृत्य का वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे लोग उत्तराखंड की सादगी और प्रेम का प्रतीक बता रहे हैं।

विशिष्ट खान-पान का भी लिया आनंद

नृत्य और संगीत के बाद आचार्य ने जौनसार के पारंपरिक व्यंजनों का भी स्वाद चखा। उन्होंने स्थानीय मोटे अनाज (Mandua) और पहाड़ी दालों के महत्व को बताते हुए इन्हें स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम बताया।

“जौनसार की धरती पर आकर और यहाँ के पारंपरिक ‘जूडौ’ को पहनकर मुझे आत्मिक शांति का अनुभव हुआ। यहाँ के लोक नृत्यों में जो लय और एकता है, वह हमें आपस में जोड़ती है। हमें अपनी इस अनमोल विरासत को हर हाल में जीवित रखना होगा।” — आचार्य बालकृष्ण, महामंत्री पतंजलि योगपीठ

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