रामनगर (नैनीताल): उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में ‘कुमाऊँनी होली’ का अपना एक विशेष स्थान है, लेकिन रामनगर के पास स्थित एक गांव में मनाई जाने वाली 194 साल पुरानी ‘खड़ी होली’ अपनी सांप्रदायिक एकता के लिए पूरे देश में मिसाल पेश कर रही है। यहाँ पिछले पौने दो सौ सालों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही है, जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग कंधे से कंधा मिलाकर होली के पारंपरिक फाग गाते हैं। सफेद कुर्ता-पायजामा और टोपी पहने जब दोनों समुदायों के लोग ढोल-मजीरों की थाप पर थिरकते हैं, तो मजहब की दीवारें पूरी तरह ढह जाती हैं।
इतिहास के झरोखे से: 1832 में शुरू हुई थी परंपरा
इस अनोखी परंपरा की शुरुआत लगभग दो सदी पहले हुई थी, जिसका इतिहास बेहद दिलचस्प है:
- मंदिर और मजार का संगम: बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा वर्ष 1832 के आसपास शुरू हुई थी। उस समय गांव के बड़े-बुजुर्गों ने आपसी भाईचारे को बढ़ाने के लिए होली को एक साझा उत्सव के रूप में मनाने का संकल्प लिया था।
- मंदिर से जुड़ा इतिहास: इस होली का मुख्य केंद्र स्थानीय शिव मंदिर और पास ही स्थित एक प्राचीन स्थान है। होली की टोली सबसे पहले मंदिर के प्रांगण में माथा टेकती है और उसके बाद पूरे गांव में घूमकर दुआएं और आशीर्वाद बांटती है।
- पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षण: इस गांव के मुस्लिम परिवार बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने यह परंपरा शुरू की थी और आज भी वे अपने बच्चों को वही ‘होली के गीत’ (फाग) सिखाते हैं जो उनके दादा-परदादा गाया करते थे।
खड़ी होली की विशेषताएं: अनुशासन और गायकी
रामनगर की इस खड़ी होली की अपनी कुछ खास विशेषताएं हैं जो इसे अन्य क्षेत्रों से अलग बनाती हैं:
- शुद्ध गायकी: यहाँ की होली में हुड़दंग के बजाय शास्त्रीय और अर्ध-शास्त्रीय रागों पर आधारित गायकी होती है। इसमें भगवान कृष्ण, शिव और मीरा के भजनों के साथ-साथ प्रेम और सद्भाव के गीत गाए जाते हैं।
- सफेद लिबास: होली गाने वाले पुरुष आमतौर पर सफेद लिबास धारण करते हैं, जो शांति और शुद्धता का प्रतीक है।
- मुस्लिम होल्यारों की भूमिका: गांव के मुस्लिम ‘होल्यार’ (होली गाने वाले) न केवल ढोलक और मजीरे बजाने में माहिर हैं, बल्कि उन्हें कुमाऊँनी खड़ी होली के कठिन पदों और बंदिशों की गहरी समझ है।
सद्भाव का संदेश: “रंग एक, दिल एक”
वर्तमान दौर में जब कई बार धार्मिक ध्रुवीकरण की खबरें आती हैं, तब रामनगर की यह 194 साल पुरानी होली एक सुकून देने वाली तस्वीर पेश करती है:
- कोई भेदभाव नहीं: यहाँ रंग लगाने से पहले गुलाल को मंदिर के चरणों में अर्पित किया जाता है, जिसे हिंदू और मुस्लिम दोनों समान श्रद्धा से ग्रहण करते हैं।
- साझा विरासत: गांव के स्थानीय निवासी बताते हैं कि “हमारे लिए होली किसी एक धर्म का त्योहार नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति है। यहाँ ईद पर हिंदू और होली पर मुस्लिम मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं छोड़ते।”





