नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नवनिर्वाचित कैबिनेट की ‘सेवा तीर्थ’ में आयोजित पहली बैठक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। केंद्र सरकार ने केरल राज्य का नाम बदलकर आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ करने की राज्य विधानसभा की मांग को अपनी मंजूरी दे दी है। इस फैसले के साथ ही देश के सांस्कृतिक गौरव और भाषाई पहचान को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। अब इस प्रस्ताव को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत संसद के दोनों सदनों में रखा जाएगा।
क्यों ‘केरलम’? – सांस्कृतिक और भाषाई महत्व
केरल राज्य सरकार ने लंबे समय से यह मांग उठाई थी कि राज्य का नाम उसकी अपनी भाषा (मलयालम) के अनुरूप ‘केरलम’ होना चाहिए:
- भाषाई गौरव: मलयालम भाषा में राज्य को ‘केरलम’ ही कहा जाता है। राज्य सरकार का तर्क था कि ‘केरल’ शब्द औपनिवेशिक काल का एक अपभ्रंश है, जिसे बदलना अत्यंत आवश्यक है।
- ऐतिहासिक जुड़ाव: विशेषज्ञों का मानना है कि ‘केरलम’ शब्द राज्य की प्राचीन संस्कृति और भौगोलिक पहचान को अधिक सटीकता से प्रदर्शित करता है।
कैबिनेट बैठक: पहला फैसला और बड़ा संदेश
‘सेवा तीर्थ’ में हुई इस पहली कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लेना कई मायनों में प्रतीकात्मक है:
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: मोदी सरकार द्वारा लिए गए इस फैसले को ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ते हुए देश की जड़ों को मजबूती देने के तौर पर देखा जा रहा है।
- राज्य-केंद्र समन्वय: यह निर्णय संघीय ढांचे (Federal Structure) की मजबूती का भी प्रतीक है, जहां केंद्र सरकार ने राज्य विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव का सम्मान करते हुए उसे प्राथमिकता दी है।
अगली संवैधानिक प्रक्रिया
नाम परिवर्तन की यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, इसके लिए निम्नलिखित चरणों का पालन आवश्यक है:
- संसदीय मंजूरी: संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी भी राज्य का नाम बदलने के लिए संसद के दोनों सदनों में साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।
- संविधान संशोधन: एक बार संसद से पारित होने के बाद, इसे संविधान की पहली अनुसूची (First Schedule) में भी अपडेट किया जाएगा, जिसके बाद भारत के आधिकारिक दस्तावेजों में राज्य का नाम ‘केरलम’ दर्ज हो जाएगा।





