कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि कानून को विभिन्न धर्मों के बीच किसी भी प्रकार का मतभेद या भेदभाव नहीं करना चाहिए। न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने टिप्पणी की कि मंदिर केवल धार्मिक अनुष्ठान के केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रतीक भी हैं, जहाँ श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति जा सकता है।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ: ‘श्रद्धा’ सर्वोपरि
अदालत ने याचिका पर सुनवाई करते हुए धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत आस्था के बीच संतुलन पर जोर दिया:
- समानता का सिद्धांत: कोर्ट ने कहा कि हमारा संविधान और कानून सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देते हैं। केवल धर्म के आधार पर किसी को सार्वजनिक धार्मिक स्थल से दूर रखना संवैधानिक भावना के विपरीत है।
- आस्था का कोई धर्म नहीं: पीठ ने माना कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू नहीं है लेकिन उसकी मंदिर के देवता या वहां की आध्यात्मिकता में सच्ची श्रद्धा है, तो उसे प्रवेश से रोकना अनुचित है।
- सांस्कृतिक मेलजोल: अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि केरल के कई मंदिरों का इतिहास सभी समुदायों के बीच सद्भाव का रहा है, और ऐसे में किसी भी प्रकार का प्रतिबंध इस सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकता है।
क्या थी याचिका और याचिकाकर्ता के तर्क?
यह याचिका एक स्थानीय संगठन द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि:
- शुद्धता का तर्क: याचिकाकर्ता का कहना था कि गैर-हिंदुओं के प्रवेश से मंदिरों की पवित्रता और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर असर पड़ता है।
- प्रवेश पर रोक: याचिका में मांग की गई थी कि केवल उन्हीं लोगों को अनुमति दी जाए जो हिंदू धर्म में विश्वास रखते हैं और इसे प्रमाणित कर सकते हैं।
- सुरक्षा का हवाला: दलील दी गई थी कि सुरक्षा कारणों और भीड़ नियंत्रण के लिए ऐसे प्रतिबंध जरूरी हैं।
हालांकि, अदालत ने इन तर्कों को अपर्याप्त माना और कहा कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन का काम है, न कि किसी विशेष समुदाय को प्रतिबंधित करना।
केरल के मंदिरों की परंपरा और विवाद
केरल में मंदिरों में प्रवेश को लेकर यह विवाद नया नहीं है। गुरुवयूर मंदिर और सबरीमाला जैसे प्रसिद्ध स्थलों पर अक्सर गैर-हिंदुओं या विशेष आयु वर्ग के प्रवेश को लेकर कानूनी लड़ाइयां चलती रही हैं।
- ऐतिहासिक संदर्भ: कोर्ट ने अपने आदेश में पूर्व के उन उदाहरणों का भी उल्लेख किया जहाँ गैर-हिंदू गायकों और कलाकारों ने मंदिरों में अपनी सेवाएँ दी हैं।
- भविष्य का प्रभाव: इस फैसले से उन लोगों को बड़ी राहत मिली है जो हिंदू धर्म का पालन तो नहीं करते लेकिन मंदिरों की वास्तुकला, शांति और दर्शन में रुचि रखते हैं।





