नई दिल्ली: बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और साइबर सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में बढ़ती चिंताओं के बीच अब भारत का एक प्रमुख राज्य (संभावित रूप से कर्नाटक या महाराष्ट्र, जहाँ इस पर चर्चा तेज है) ऑस्ट्रेलिया के नक्शेकदम पर चलने की योजना बना रहा है। सरकार एक ऐसा कानून लाने पर विचार कर रही है, जिसके तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित किया जा सकता है। इस कदम का उद्देश्य किशोरों को साइबर बुलिंग, स्क्रीन एडिक्शन और आपत्तिजनक सामग्री से बचाना है।
ऑस्ट्रेलिया ने पेश किया है कड़ा कानून हाल ही में ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने एक ऐतिहासिक विधेयक पेश किया है, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने का प्रावधान है। वहां की सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह पाबंदी फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और एक्स (X) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लागू होगी। यदि कंपनियां इस नियम का उल्लंघन करती हैं, तो उन पर भारी जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। अब इसी मॉडल को भारतीय परिप्रेक्ष्य में लागू करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
क्यों महसूस हुई प्रतिबंध की जरूरत? राज्य सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और बाल कल्याण विभाग के विशेषज्ञों ने बच्चों पर सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों को लेकर कई गंभीर तर्क दिए हैं:
- मानसिक स्वास्थ्य: सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में अवसाद (Depression), चिंता और नींद की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
- साइबर अपराध: कम उम्र के बच्चे ऑनलाइन ठगी और ‘ग्रूमिंग’ जैसे साइबर अपराधों का आसान शिकार बन जाते हैं।
- पढ़ाई पर असर: एडिक्टिव एल्गोरिदम के कारण बच्चे घंटों मोबाइल पर बिता रहे हैं, जिससे उनके शैक्षणिक प्रदर्शन और शारीरिक गतिविधियों में गिरावट आई है।
उल्लंघन पर कंपनियों को देना होगा भारी जुर्माना प्रस्तावित कानून के तहत जिम्मेदारी केवल माता-पिता पर नहीं, बल्कि तकनीकी कंपनियों (Tech Giants) पर भी डाली जाएगी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ‘एज वेरिफिकेशन’ (आयु सत्यापन) की ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी जो अचूक हो। यदि कोई प्लेटफॉर्म 16 साल से कम उम्र के बच्चे को अकाउंट बनाने की अनुमति देता है, तो उस कंपनी पर करोड़ों रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है।
चुनौतियां और विशेषज्ञों की राय हालांकि इस योजना को लेकर विशेषज्ञों में मतभेद भी हैं। कुछ का मानना है कि ‘वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क’ (VPN) के दौर में इसे पूरी तरह लागू करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती होगी। वहीं, दूसरी ओर अभिभावकों के एक बड़े वर्ग ने सरकार के इस संभावित कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए डिजिटल दुनिया पर लक्ष्मण रेखा खींचना अब अनिवार्य हो गया है।
सरकार फिलहाल इस मुद्दे पर कानूनी विशेषज्ञों और तकनीकी विशेषज्ञों से सलाह ले रही है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो जल्द ही इस पर नीतिगत घोषणा की जा सकती है।





