देहरादून: उत्तराखंड में बाघों की संख्या में पिछले डेढ़ दशक में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2006 में जहां राज्य में बाघों की संख्या 178 थी, वहीं वर्ष 2022 की गणना में यह बढ़कर 560 पहुंच गई। बाघ संरक्षण की इस सफलता के बीच स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स (STPF) में बड़ी संख्या में पद खाली होने से सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता भी सामने आई है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड में बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण प्रयासों, बेहतर आवास प्रबंधन और शिकार प्रजातियों की उपलब्धता का परिणाम है। राज्य में स्थित कॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व बाघ संरक्षण के प्रमुख केंद्र हैं। वर्ष 2022 की गणना में उत्तराखंड देश के प्रमुख बाघ बहुल राज्यों में शामिल रहा।
हालांकि, बाघों की बढ़ती आबादी के साथ उनकी सुरक्षा की चुनौती भी बढ़ रही है। इसी को देखते हुए गठित स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स में स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में रिक्तियां बनी हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एसटीपीएफ में 81 पद खाली हैं, जिससे जंगलों में गश्त और निगरानी व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बाघों की सुरक्षा के लिए गश्त, कैमरा ट्रैप निगरानी और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा बाघों के आवास क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप कम करने और वन्यजीव अपराधों पर नियंत्रण के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं।
राज्य में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी चुनौती बन रही हैं। जंगलों के आसपास बसे क्षेत्रों में बाघों की आवाजाही बढ़ने से लोगों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना वन विभाग के लिए अहम जिम्मेदारी बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाघ संरक्षण की उपलब्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की तैनाती जरूरी है। एसटीपीएफ के खाली पदों को भरना और निगरानी तंत्र को मजबूत करना आने वाले समय में राज्य के वन्यजीव संरक्षण अभियान की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।





