हैदराबाद/नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए युद्ध विराम (Ceasefire) के समझौते पर एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर कड़ा प्रहार किया है। बुधवार को एक प्रेस वार्ता के दौरान ओवैसी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आंतरिक सुरक्षा जैसे गंभीर विषय कोई ‘तीन घंटे की फिल्म का मजाक’ नहीं हैं। उन्होंने मध्यस्थता के मामले में भारत की चुप्पी और पड़ोसी देश पाकिस्तान की सक्रियता पर सवाल उठाते हुए मोदी सरकार को लेबनान के मुद्दे पर खुलकर बोलने की चुनौती दी है।
“विफल राष्ट्र निभा रहा मध्यस्थ की भूमिका”
ओवैसी ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते में पाकिस्तान की मध्यस्थता का जिक्र करते हुए सरकार को घेरा।
- कूटनीतिक चूक का आरोप: उन्होंने कहा कि जो भूमिका भारत जैसे बड़े और शक्तिशाली राष्ट्र को निभानी चाहिए थी, वह आज एक ‘विफल राष्ट्र’ (पाकिस्तान) निभा रहा है। उनके अनुसार, वैश्विक मंच पर भारत के प्रभाव को देखते हुए इस मध्यस्थता का नेतृत्व नई दिल्ली को करना चाहिए था।
- गंभीरता की कमी: ओवैसी ने तंज कसते हुए कहा कि विदेश नीति को हल्के में लेना देश के हितों के साथ खिलवाड़ है।
लेबनान में इस्राइली कार्रवाई पर खामोशी पर सवाल
सांसद ओवैसी ने मध्य पूर्व (Middle East) के बिगड़ते हालात, विशेषकर लेबनान और इस्राइल के संघर्ष पर भारत के रुख की आलोचना की।
- लेबनान में जंगबंदी की मांग: उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह अपनी वैश्विक शक्ति का उपयोग कर लेबनान में तुरंत जंगबंदी कराए। उन्होंने कहा कि सरकार को खुलकर यह बोलना चाहिए कि इस्राइल जो लेबनान में कर रहा है, वह पूरी तरह गलत है।
- क्षेत्रीय संप्रभुता का मुद्दा: ओवैसी ने दावा किया कि इस्राइल ने लेबनान के लगभग 20 प्रतिशत भूभाग पर कब्जा कर लिया है। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि यदि हम दूसरों की जमीन पर कब्जे के खिलाफ खामोश रहेंगे, तो हम भविष्य में अक्साई चिन और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) को वापस पाने का नैतिक दावा कैसे करेंगे?
युद्ध विराम का स्वागत, लेकिन सरकार को दी सलाह
हालांकि ओवैसी ने ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने का स्वागत किया, लेकिन उनकी चिंता भारत की रणनीतिक स्थिति को लेकर थी।
“युद्ध विराम होना अच्छी बात है क्योंकि इससे मासूम लोगों की मौतें कम होंगी। मगर अभी भी वक्त है कि भाजपा सरकार अपनी विदेश नीति की समीक्षा करे। हमें केवल दर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि वैश्विक शांति की दिशा में निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए।”





