नई दिल्ली। जम्मू–कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के हालिया बयान पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आतंकवाद की उत्पत्ति को केवल जम्मू–कश्मीर तक सीमित कर देखना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि इस समस्या की जड़ें वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों, भू-रणनीतिक तनावों और चरमपंथी विचारधाराओं से निकली हैं, जिनके प्रभाव भारत सहित पूरी दुनिया पर पड़े हैं।
नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला ने हाल ही में कहा था कि “भारत में आतंकवाद की शुरुआत जम्मू–कश्मीर से हुई।”
उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और इसे लेकर नई बहस छिड़ गई।
शशि थरूर ने कहा कि आतंकवाद को किसी एक भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ना विषय की गंभीरता को कम आंकने जैसा है।
उन्होंने कहा—
“आतंकवाद का उभार केवल जम्मू–कश्मीर की देन नहीं है। दुनिया के कई हिस्सों में उभरी कट्टरपंथी विचारधाराएँ, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव और आर्थिक–सामाजिक अस्थिरता इसके बड़े कारण रहे हैं। भारत भी इन्हीं वैश्विक घटनाक्रमों से प्रभावित हुआ है।”
थरूर ने यह भी कहा कि वैश्विक शक्तियों की प्रतिस्पर्धा और पड़ोसी देशों की नीतियों ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया, जिसका प्रभाव 1990 के दशक में जम्मू–कश्मीर पर सबसे पहले दिखाई दिया।
थरूर के बयान पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है।
- कांग्रेस नेताओंने कहा कि थरूर ने विषय को सही संदर्भ में प्रस्तुत किया है, क्योंकि आतंकवाद का मूल किसी एक राज्य या समुदाय को ठहराना सरलीकृत दृष्टिकोण होगा।
- वहीं बीजेपी नेताओंने कहा कि कांग्रेस नेता आतंकवाद के वास्तविक इतिहास को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं और इससे सुरक्षा बलों के बलिदानों का महत्व कम होता है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकवाद अपने शुरुआती चरण में ही अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से संचालित रहा है।
अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मध्य-पूर्व और पश्चिमी देशों की नीतियों ने चरमपंथी संगठनों को पनपने का अवसर दिया, जिसका असर भारत सहित कई देशों पर पड़ा।
फारूक अब्दुल्ला और शशि थरूर के बयानों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आतंकवाद की जड़ों को कैसे परिभाषित किया जाए और उसके वास्तविक कारण क्या हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर टीवी डिबेट तक चर्चा का केंद्र बना रहेगा।
भारत में आतंकवाद पर जारी इस नए विमर्श ने राष्ट्रीय सुरक्षा, इतिहास और भू-राजनीति को एक साथ केंद्र में ला दिया है।





