नई दिल्ली। देश की सुरक्षा में तैनात अर्धसैनिक बलों के जवान और अधिकारी एक बार फिर न्याय और समान अधिकारों की मांग को लेकर चर्चा में हैं। अदालत से अपने पक्ष में फैसले मिलने के बावजूद उन्हें न तो पदोन्नति (Promotion) का लाभ मिल पा रहा है और न ही ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की सुविधा का। इससे हजारों कर्मियों में गहरी निराशा और असंतोष देखने को मिल रहा है।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF), सशस्त्र सीमा बल (SSB), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) जैसे अर्धसैनिक बलों में तैनात कर्मियों का कहना है कि वे वर्षों से समान अधिकारों की मांग कर रहे हैं। कई मामलों में अदालत ने उनके पक्ष में आदेश भी दिए, लेकिन नीतिगत जटिलताओं और प्रशासनिक देरी के कारण आदेशों को अब तक लागू नहीं किया गया है।
अदालत से जीती लेकिन जमीनी हकीकत अलग
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट और कुछ अन्य न्यायिक मंचों ने कई याचिकाओं पर निर्णय देते हुए कहा था कि अर्धसैनिक बलों को केंद्र सरकार के अन्य विभागों के समान पदोन्नति, सेवा शर्तें और पेंशन लाभ मिलने चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया था कि इन बलों के कर्मी भी केंद्रीय सेवाओं का हिस्सा हैं, इसलिए उनके साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।
इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर स्थिति में खास सुधार नहीं आया है। कई सेवानिवृत्त अधिकारी बताते हैं कि प्रशासनिक निर्णयों में देरी और वित्तीय अनुमोदन की प्रक्रिया के कारण न्यायिक आदेशों का लाभ लाखों कर्मियों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
ओपीएस की मांग अब भी अधूरी
एक अन्य प्रमुख मुद्दा है ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS)। अर्धसैनिक बलों के जवानों का कहना है कि वे भी सेना की तरह कठिन और जोखिमभरी परिस्थितियों में काम करते हैं, लेकिन उन्हें नई पेंशन स्कीम (NPS) के दायरे में रखा गया है। उनका तर्क है कि समान परिस्थितियों में काम करने के बावजूद उन्हें पुरानी पेंशन की सुविधा से वंचित रखना अन्यायपूर्ण और असमान व्यवहार है।
सेवानिवृत्त अधिकारी संघों का कहना है कि इस मुद्दे को बार-बार गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के समक्ष उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द विचार नहीं किया गया तो वे फिर से सामूहिक आंदोलन या अदालत की शरण ले सकते हैं।
सरकार की दलील और मौजूदा स्थिति
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अर्धसैनिक बलों की संरचना और पदोन्नति नीति सेना से अलग है। वहीं, ओपीएस को बहाल करने का मुद्दा केंद्र स्तर पर नीति निर्णय से जुड़ा हुआ है, जिस पर वित्त मंत्रालय विचार कर रहा है।
फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि देश की सीमाओं, आंतरिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन में अग्रिम पंक्ति में डटे इन जवानों की समस्याओं को संवेदनशील दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
अर्धसैनिक बलों के हजारों जवान और अधिकारी आज भी अदालत के आदेशों के बावजूद पदोन्नति और पेंशन लाभ से वंचित हैं। उनकी यह स्थिति एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि देश की सुरक्षा में जुटे इन सच्चे सिपाहियों को न्याय कब मिलेगा?





