नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के एक वायरल वीडियो को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। इस वीडियो में मुख्यमंत्री एक राइफल से शूटिंग करते हुए नजर आ रहे थे, जिसे लेकर विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आपत्ति दर्ज कराई थी। कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए बेहद कड़ी टिप्पणी की और कहा कि राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ ऐसी छोटी-छोटी बातों पर अदालत का दरवाजा खटखटाना अब एक ‘ट्रेंड’ बन गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक समय का उपयोग गंभीर संवैधानिक और कानूनी मुद्दों के लिए होना चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वीडियो के विवादों को सुलझाने के लिए।
क्या था मामला? वीडियो पर मचा था सियासी बवाल
यह विवाद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के एक वीडियो से शुरू हुआ था, जो कुछ समय पहले सार्वजनिक हुआ था:
- वीडियो का हिस्सा: वीडियो में मुख्यमंत्री को एक फायरिंग रेंज में राइफल चलाते हुए दिखाया गया था।
- याचिकाकर्ता का तर्क: याचिका में दावा किया गया था कि एक उच्च पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह हथियारों का प्रदर्शन करना कानून का उल्लंघन है और इससे समाज में गलत संदेश जाता है।
- पूर्व की कार्रवाई: इससे पहले गौहाटी हाईकोर्ट ने भी इस मामले में दखल देने से मना कर दिया था, जिसके बाद मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘न्यायालय को राजनीतिक अखाड़ा न बनाएं’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील को आड़े हाथों लिया और कई अहम बातें कहीं:
- ट्रेंड पर प्रहार: कोर्ट ने कहा, “आजकल यह एक चलन बन गया है कि मुख्यमंत्री या किसी नेता का कोई भी वीडियो सामने आता है, तो सीधे कोर्ट पहुँच जाते हैं। यह अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
- पद की गरिमा: कोर्ट ने संकेत दिया कि किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम या शूटिंग रेंज में हथियार चलाना अपराध की श्रेणी में नहीं आता जब तक कि वह किसी कानून का स्पष्ट उल्लंघन न कर रहा हो।
- समय की बर्बादी: अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि ऐसी याचिकाओं से वास्तविक न्याय चाहने वाले लोगों का समय बर्बाद होता है।
हाईकोर्ट के फैसले को रखा बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में गौहाटी हाईकोर्ट के पुराने फैसले का समर्थन किया। हाईकोर्ट ने पहले ही यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि:
- वीडियो में कुछ भी ऐसा ‘आपत्तिजनक’ या ‘गैरकानूनी’ नहीं है जिससे किसी की सुरक्षा को खतरा हो।
- मुख्यमंत्री के खिलाफ इस मामले में कोई भी एफआईआर (FIR) दर्ज करने का पर्याप्त आधार नहीं है।





