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‘अपने खिलाफ जंग को फाइनेंस कर रहा यूरोप’: भारत-EU डील पर अमेरिका के तेवर तल्ख; ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ से डरा वॉशिंगटन

वॉशिंगटन/नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने वैश्विक राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जहाँ एक ओर नई दिल्ली और ब्रुसेल्स इस ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ का जश्न मना रहे हैं, वहीं अमेरिका इस गठबंधन से बुरी तरह चिढ़ गया है। अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों और ट्रंप के करीबियों ने इस डील पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि यूरोप इस समझौते के जरिए उन ताकतों को आर्थिक मजबूती दे रहा है, जो भविष्य में अमेरिकी हितों को चुनौती दे सकती हैं। अमेरिका का यह बयान दोनों महाद्वीपों के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव का स्पष्ट संकेत है।

“यूरोप खुद के खिलाफ जंग को फाइनेंस कर रहा”

अमेरिकी प्रशासन की ओर से जारी तीखे बयानों में यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल उठाए गए हैं।

  • कड़ी आलोचना: अमेरिकी व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय संघ द्वारा भारत को भारी टैरिफ छूट देना अमेरिकी उत्पादों के लिए यूरोपीय बाजार को और अधिक कठिन बना देगा।
  • सुरक्षा बनाम व्यापार: ट्रंप प्रशासन के एक प्रभावशाली सलाहकार ने कहा, “यूरोप एक ओर अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी चाहता है, लेकिन दूसरी ओर वह उन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ ‘मेगा डील’ कर रहा है जो अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को नुकसान पहुँचा सकती हैं। यह अपने खिलाफ जंग को फाइनेंस करने जैसा है।”

अमेरिका की चिढ़ के पीछे के मुख्य कारण

  1. मार्केट एक्सेस का छिनना: भारत और ईयू के बीच जीरो-टैरिफ व्यापार होने से अमेरिकी कारें, मशीनरी और कृषि उत्पाद यूरोपीय और भारतीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाएंगे।
  2. चीन से ध्यान हटना: अमेरिका चाहता था कि यूरोप पूरी तरह से उसके ‘इंडो-पैसिफिक’ विजन के साथ चले, लेकिन यूरोप ने भारत के साथ स्वतंत्र आर्थिक रास्ता चुन लिया है।
  3. रक्षा सौदे: अमेरिका को डर है कि इस व्यापार समझौते के बाद भारत और फ्रांस-जर्मनी जैसे देशों के बीच रक्षा संबंधों में और प्रगाढ़ता आएगी, जिससे अमेरिकी रक्षा बाजार (जैसे लॉकहीड मार्टिन, बोइंग) को नुकसान होगा।

भारत-EU डील: क्यों है यह ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’?

यह समझौता केवल सामान बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में तकनीक हस्तांतरण और ग्रीन एनर्जी भी शामिल है।

  • टैरिफ की दीवार गिरी: इस डील के बाद लग्जरी सामानों और वाइन पर टैक्स कम होने से अमेरिकी उत्पादों की तुलना में यूरोपीय उत्पाद भारत में 30-40% सस्ते हो सकते हैं।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: भारत ने इस डील के जरिए दुनिया को संदेश दिया है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था के लिए किसी एक महाशक्ति (अमेरिका) पर निर्भर नहीं है।

यूरोप का करारा जवाब

अमेरिकी आपत्तियों पर यूरोपीय संघ के राजनयिकों ने भी कड़ा रुख अपनाया है। यूरोपीय आयोग के एक प्रवक्ता ने संकेत दिया कि यूरोप अपने आर्थिक हितों के लिए स्वतंत्र है और वह अमेरिका की ‘संरक्षणवादी’ (Protectionist) नीतियों का बंधक नहीं बनेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के साथ यह समझौता भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था की जरूरत है।

विशेषज्ञों की राय: ‘त्रिकोणीय व्यापार युद्ध’ की आहट?

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका की यह ‘चिढ़’ आने वाले समय में भारत और यूरोप पर नए प्रतिबंधों या काउंटर-टैरिफ के रूप में सामने आ सकती है। डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत अमेरिका अब भारत और यूरोप दोनों पर दबाव बना सकता है कि वे अमेरिकी उत्पादों के लिए भी इसी तरह की रियायतें दें।

“अमेरिका का बयान उसकी हताशा को दर्शाता है। उसे डर है कि भारत और यूरोप का यह गठबंधन वैश्विक सप्लाई चेन में अमेरिकी वर्चस्व को खत्म कर देगा।” — वैश्विक व्यापार विश्लेषक

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